उठालो मशाल लिख दो फरमान,
सोए हुए क्यों हो ?, बता दो अरमान !
हर जोर-जुल्म कि टक्कर में पर्चा बुलन्द करो,
जालिमों कि बस्ती और हस्तीको मशाल से फुँक दो !!

वक्त कि अंगडाईको सम्झओं, नासमझ कि चोला उतार फेको !
लडना-भिड्ना तो पडेगा हि, क्यों कि यह अस्तित्व कि लडाई है,
धर्म-युद्धका शंखनाद होचुका है, श्री गणेश करने आ-जाओ,
नहि तो खुद को इतिहास कि पन्नओं मे ढुंढ्ते रह जाओगे !!

नासमझ बने क्यों बैठे हो तुम ?, अब तो जागो !
समय कि चक्र को पेहचान, खुद को अब तैयार करो !
वक्त कि आवज को सुनो, साँसे थाम के क्यों बैठे हो तुम ?
उठालो मशाल, मुक्ति पथ पर आने से क्यों डरते हो तुम ?

नासमझी का भि एक हद होता है,
जब जुल्मों-सितम ने हद पार कर दि हो,
मुक्ति-संग्राम का शंखनाद होचुका, चुप क्यों बैठे हो तुम ?
सब कुछ लूटाकर चुप्पी साद्धे क्यों बैठे हो तुम ?

तुम्हारी चुप्पीको चाप्लुसी और कायरता सम्झा जारहा है,
तुम कायर नहि होसकते, तुम तो वीरओं कि सन्तान हो !
तुम तो जनक और जानकी कि धरोहर हो,
तुम तो जनतन्त्र कि संवाहक हो, संरक्षक हो !!

क्या रोक पाऐगी कोई बन्दिसे हमे,
हम तो काँटो पर भि चलने का हुनर जानते है,
क्या रोकेगी गोलियों कि बौछार हमे,
हम तो आसमान का सिना चिरने का हुनर जानते है,
ना रोक पाऐगी हमें समुन्दर कि तुफान ना हि कोई दीवार,
वक्त आगया है अब, जन-जन लिखेंगे अपने हाथों से देश का फरमान !!

जय क्रान्ति ! जय जनता जय जनतन्त्र !!!

डा. मनोज मुक्ति “विवेक”
(डा. मनोज कुमार झा)
राष्ट्रिय अध्यक्ष
जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चा
एवं राष्ट्र बचाउ अभियान

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