अखनके लोकके पतन भगेल नैतिकता आ गमा लेलक ईमान!
घोर कलयुग चैलयाल लोकसब बैन रहल एह नदान!!

कोई कर्मचारी,कोइ कुछ बनल कोई पाईलट बैइन चल्बैय विमान!
मगर लाज लगैय कहैत अपना बाबुके किसान!!

जौ किसान नै उब्जाउत अन्न गहुँ,मकै आ धान!
नेता,मन्त्री,कर्मचारी आ हम अहा जनता केनाक बच्याब अपन प्राण!!

कह्बैई छि कृषिप्रधान देश मगर कृषकके करैछी अपमान!
स्थानीय सरकार भेलाके बादो कृषिक्षेत्रमे नै करैछी लगान!!

खाद्य,पानी,बियाँ,बाईलके महँगि कारण कृषक छै परेशान!
भासन करत नेता बड्का बड्का खाली,मुदा कृषक के समस्या नैकरत समाधान!!

कोइ कुछो करु देश चलाउ या बैज्ञानिक बैन उडाउ अन्तरीक्षयान! फिरभि किसाने के करे परत सम्मान!!
कैलाकी किसाने के परिश्रमके फल पर निर्भर है सब के प्राण!!!

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