घर घर देखा ,एकही लेखा

भारत के कहने छैत नेता

जुईत आ सत्ता  लडाई के राज

हुकुम आ शासन करब, पहिरब ताज

एक मियानमे दुटा तलबार

कोना चलत घर संसार

 

युवा पुस्ता कहि, पुरानके देखु एहन व्यबहार

अपन बर्चस्व  आ शासन लेल , भअरहल  अछि बोली प्रहार

छाइन छाइन  आ चुइन चुइन , बसबैत नव संसार

स्वार्थ अपन पुरालेल , भेल ,सबहक हाल बेहाल

मान सम्मान मात्र अप्पन देखि , कोना चलत संसार

 

लागब जखन सुधारमे अप्पन , लागत नव युग

उजरे चाउरमे उजरे पाथर, बीतरहल घनघोर कल्युग

संघर्ष घरे स  , बर्चस्व  , शासन आ सत्ता बचाव के अप्पन

सत्य ,उत्तम निर्णय बिसरैत , कल्लह भेल जखन

लातमारी बिकासके , जखन , हावी भेल अप्पन स्वार्थ

प्रगती , उन्नति के विचार छोडु , कल्लह अछि  जखन बडका काज

 

भेटती जँ बाटेघाट , निन्दा करैत समय बितल काज

थोरथाम कहैत आपसमे , जुनी सन्तोष करु

भगवान प्रति ध्यान धरि, हिया नै हारु

घर घर देखा एकही लेखा, अहिना नै कहने छैथ, भारत के नेता

 

एयना अछि ,एक जुलुम दबाई

आगु ठाड भअ जाउ , ताकु रामबाण उपाई

मोह छोडी शासन ,सत्ता  आ अभिमान

हात मिलाकअ  आपसमे , करु मान सम्मान।।।

जय मिथिला ,जय माता जानकी जी।।

रचियता : ज्योति कुमारी झा ( समाजशास्त्री )

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